सहिष्णुता

इस्लाम सहिष्णुता का प्रतिक है

सफात आलम मदनी

इस्लाम ही सच्चा धर्म है, सारी दुनिया की मुक्ति केवल इस्लाम में है। इस्लाम के अतिरिक्त जितने भी धर्म हैं नरक के रास्ते पर ले जाने वाले हैं, जन्नत (स्वर्ग) का दरवाजा केवल इस्लाम है, यह है इस्लाम का ऐसा ठोस विश्वास जिस में वह किसी तरह से समझौता के लिए राजी नहीं, परन्तु इसका अर्थ क्या यह है कि इस्लाम अपना नियम ज़बरदस्ती लोगों पर थोपता है? बिल्कुल नहीं, यह बहुत बड़ा संदेह है, जो इस्लामी नियम से अज्ञानता के कारण लोगों के मन मस्तिष्क में पाया जाता है, याद रखें इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो प्रत्येक मानवता को मात्र एक अल्लाह से सीधा जोड़ता और उन सब को एक माता पिता की संतान और भाई भाई होने की कल्पना देता है, और यह कहता है कि अगर किसी इस्लामी देश में विभिन्न धर्मों के मानने वाले रहते हों तो इस्लाम अन्य धर्मों के अनुयाइयों के साथ हर तरह से नरम रवैया अपनाया जाए, सहिष्णुता में विश्वास रखा जाए, मतलब यह कि दूसरों के धार्मिक विश्वासों, भावनाओं, और संस्कृति का सम्मान किया जाए, इस संबंध में कोई ऐसा काम न किया जाए कि उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचे।

इस्लाम में ज़बरदस्ती नहीं:

 इस्लाम अपना सिद्धांत स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत करता है। अल्लाह तआला ने कहा:

قُلِ الْحَقُّ مِنْ رَبِّکُمْ فَمَنْ شَاءَ فَلْیُوْمِنْ وَمَنْ شَاءَ فَلْیَکْفُرْ(سورہ الکہف 29

आप कह दीजीए कि सत्य तेरे रब की ओर से है, अब जिसका जी जाहे मान ले और जिसका जी चाहे इनकार कर दे। (सूरः कहफ़ 29 )

हर आदमी को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी इच्छानुसार जिस विचारधारा को चाहे अपनाए, आपका काम सत्य बयान कर देना है, मानना न मानना उसका काम है, लेकिन अगर कोई सत्य को नहीं मानता है तो दुनिया में इस आधार पर ऐसे आदमी के साथ बुरा मामला नहीं किया जा सकता। उसे मूल मानव अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

 इस्लाम अपना नियम दूसरों पर जबरदस्ती थोपने से मना करता है, अल्लाह तआला कहता है:

لاَ اکْرَاہَ فِی الدِّیْنِ (سورۃ البقرہ 256  

 धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। (सूरः अल-बक़राः 256)

एक अन्य स्थान पर अल्लाह ने कहाः

وَلَوْ شَاءَ رَبُّكَ لَآمَنَ مَنْ فِي الْأَرْضِ كُلُّهُمْ جَمِيعًا أَفَأَنْتَ تُكْرِهُ النَّاسَ حَتَّى يَكُونُوا مُؤْمِنِينَ  )يونس: 99

“यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती में जितने लोग है वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ?” (सूरः यूनुस 99)

अच्छा व्यवहार और परस्पर संबंधः

सिर्फ इतना ही नहीं कि इस्लाम ने ग़ैर मुसलमानों की भावनाओं की रिआयत की और उन्हें इस्लामी राज्य में पूरा अधिकार दिया बल्कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस से आगे बढ़कर मक्का विजय के अवसर पर अपने जानी दुश्मनों के साथ जो क्षमा का मामला क्या दुनिया का पूरा मानव इतिहास वैसी मिसाल पेश करने से आजिज़ है। कुरआन की शिक्षा तो यह है कि

اِدْفَعْ بِالتِي ہِيَ أحْسَنُ فَاذَ الَّذِيْ بَیْنَکَ وَبَیْنَہ عَدَاوَةٌ کَأَنَّہ وَلِيٌّ حَمِیْم․ (حمٓ السجدہ:34 

तुम बुराई को अच्छाई से दूर करो जो अच्छी हो, तुम देखोगे कि तुम्हारा दुश्मन जिगरी दोस्त बन जाएगा। (सूरः फुस्सिलत: 34)

सामान्य मामलों में इस्लाम मुस्लिम और गैर मुस्लिम के बीच अंतर नहीं करता, क़ुरआन में अल्लाह ने कहाः

لَّا يَنْهَاكُمُ اللَّـهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَارِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّـهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ   ( سورة الممتحنة: 8

अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है. (सूरः अल-मुमतहिनाः 8) 

प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके साथियों ने व्यावहारिक रूप में उसे बरत कर दिखाया, जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हिजरत  कर के मदीना आ गए तो एक साल मक्का के काफिर अकाल से पीड़ित हो गए, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़ुरैश के सरदार अबू सुफ़यान बिन हर्ब और सफवान बिन उमय्या के पास पाँच सौ दिरहम भेजे ताकि वे मक्का के जरूरतमंदों और दरिद्रों में वितरित कर दें। हालांकि उस समय ये दोनों मुसलमानों के विरोध में आगे आगे थे। स्वयं  मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ग़ैर-मुस्लिमों की दावत स्वीकार की है, ग़ैर-मुस्लिमों को खाने पर बुलाया है, उन्हें अपना अतिथि बनाया है, ग़ैर-मुस्लिमों की अयादत की है, बद्र युद्ध के ग़ैर-मुस्लिम कैदियों में जो साक्षर थे उन्हें पढ़ाने लिखाने के लिए रखा है। उसी तरह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ग़ैर-मुस्लिमों के साथ व्यापार की है।

जान, माल और इज़्ज़त की सुरक्षाः

इस्लाम ने ग़ैर-मुस्लिमों की जान, माल और इज़्ज़त को वही महत्व दिया है जो मुसलमानों की जान, मात और इज़्ज़त को दी है। मदीना में जब इस्लाम का प्रथम राज्य स्थापित हुआ तो मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वहाँ के गैर-मुस्लिमों विशेष रूप में यहूदियों से समझौता किया, उनकी जान, माल और सम्मान की सुरक्षा की गारंटी दी, उनको बराबर का नागरिक बताया, उन्हें धार्मिक और राजनीतिक अधिकार दिए और यह तय पाया कि दोनों पक्ष मिलकर दुश्मनों से मदीना की रक्षा करेंगे। इसके लगभग 52 प्रावधान थे जो मीसाक़े मदीना के नाम से प्रसिद्ध हैं।

मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया कि उनके ख़ून हमारे ख़ून के समान और उनके माल हमारे माल के समान हैं। इस्लाम की दृष्टि में किसी एक इनसान की हत्या करना जिसने किसी की जान न ली हो न धरती में फसाद मचाया हो सारी मानवता की हत्या करने के समान है, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो। (क़ुरआन 5: 32) और इस्लाम के अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद जी ने कहाः जिसने किसी एक गैरमुस्लिम की हत्या कर दी जो इस्लामी देश में शान्ति के साथ रहता था तो वह महाप्रलय के दिन स्वर्ग की सुगन्ध भी न पा सकेगा। (सही बुख़ारी 3166) इस से आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस्लाम मानवता की रक्षा पर कितान बल देता है। 

और इस्लाम में जिहाद की अनुमति वास्तव में फसाद और अत्याचार को ख़त्म करने के लिए दी गई है जिस से समाज में शान्ति पैदा होती और बुराइयां समाप्त होती हैं। (क़ुरआन 22: 39)

गैर मुस्लिमों की सम्पत्ति भी मुसलमानों की सम्पत्ति के समान हैं, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः

जिस किसी ने किसी मुआहिद पर अत्याचार किया, उसका हक़ नहीं दिया, या उसे उसकी शक्ति से ज़्यादा का मुकल्लफ किया, या उस से उसकी कोई चीज़ उसकी सहमति के बिना ले ली, तो मैं महा-प्रलय के दिन उसका हरीफ़ हूंगा। (सुनन अबी दाऊद 3053) उसी प्रकार यदि कोई मुसलमान किसी गैरमुस्लिम का माल चोरी कर ले तो इस स्थिति में भी उसका हाथ काट लिया जाएगा। (अल-मुग़नी 12/451)

उसी प्रकार ग़ैरमुस्लिमों की इज़्ज़त का वही महत्व है जो मुसलमान की इज़्ज़त का है, इसमें मुसलमान और गैरमुस्लिम में कोई अंतर नहीं।

न्याय सब के लिएः

न्यान के सम्बन्ध में इस्लाम मित्र तथा शत्रु, मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम में अंतर नहीं करता। इस्लाम शत्रुओं के साथ भी न्याय को अनिवार्य ठहराता है, अल्लाह ने कहाः

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَى أَلَّا تَعْدِلُوا اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَى وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ )المائدة: 8

“ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है।” ( सूरः अल-माइदाः8)

धार्मिक सहिष्णुता:

इस्लाम धार्मिक सहिष्णुता का प्रतिक है, इस्लाम ने दूसरों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और उनकी भगवानों के प्रति अपशब्द कहने से मना किया है,  अल्लाह ने कहा:

وَلاَ تَسُبُّو الَّذِیْنَ یَدْعُوْنَ مِنْ دُوْنِ اللّٰہِ فَیَسُبُّوا اللّٰہَ عَدْوًا بِغَیْرِ عِلْم (سورہ انعام 108 

“अल्लाह के अलावा जिन देवताओं को ये लोग पुकारते हैं, उन्हें गाली मत दो, कहीं ऐसा न हो कि अज्ञानता के कारण वह अल्लाह को गालियां देने लगें।” (सूरः अल-अंआम 108)

एक गैर-मुस्लिम इस्लामी शासन में अपने धर्म के अनुसार जो चीज़ हलाल समझता है जैसे शराब या सुअर आदि उसका वह इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन उसे खुले तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी, एक मुसलमान की पत्नी यदि ईसाई है और वह हर सप्ताह चर्च जाना चाहती है तो पति को चाहिए कि उसे चर्च में जाने की अनुमति दे, लेकिन ईसाई पत्नी अपने बच्चों पर अपना अधिकार नहीं चला सकती। उसी तरह अगर उनका कोई केस है तो मुसलमान काजी उनकी किताब के अनुसार फैसला करने का मुकल्लफ़ होगा, जैसा कि रिवायत में आता है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक यहूदी व्यभिचारी के पक्ष में पत्थरवाह का फैसला तौरात से किया था, हालांकि हमारा ईमान है कि तौरात  और इंजील आज अपने असली रूप में शेष नहीं। (सही अबू दाऊद: 4446)

धार्मिक सहिष्णुता के कुछ उदाहरणः

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद चारों खलीफाओं ने भी धार्मिक सहिष्णुता को बरकरार रखा। उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु के युग की घटना है, जब मुसलमानों ने बैतुल-मक़्दिस पर विजय प्राप्त कर लिया तो उमर रज़ियल्लाहु अन्हु यरूशलेम पहुंचे और एलिया के निवासियों के साथ जो अनुबंध किया, इसके यह शब्द थे: “यह अनुबंध है जो अल्लाह के दास अमीरुल मोमिनीन उमर ने एलिया के निवासियों को दी, यह अनुबंध जान-माल, गिरजाघर, सलीब, स्वस्थ्य और बीमार और उन सभी धार्मिक लोगों के लिए है, न उनके गिरजाघर में किसी को रहने दिया जाएगा, न वह गिराए जाएंगे, न उनके परिसर को नुकसान पहुंचाया जाएगा, न उनके सलीबों और उनके धन में कमी की जाएगी, धर्म के बारे में उन पर कोई ज़बरदस्ती नहीं की जाएगी,  न हीं उन में से किसी को नुकसान पहुंचाया जाएगा। “

इस्लाम की सहिष्णुता देखिए कि दमिश्क की मस्जिदे कबीर की मरम्मत के लिए वलीद बिन अब्दुल मलिक ने एक चर्च के कुछ भाग को उस में शामिल कर लिया था, जब उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहिमहुल्लाह ख़लीफा हुए तो उन्होंने मस्जिद के इस भाग को तोड़ कर चर्च को वापस कर दिया।

जब अलेक्जेंड्रिया पर मुसलमानों ने विजय पाई, तो इस अवसर से एक मुस्लिम सैनिक ने ईसा अलैहिस्सलाम की एक छवि की आंख फोड़ दी. इसाइयों ने मिस्र के गवर्नर हज़रत अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु के पास शिकायत की, हज़रत अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु ने स्वयं उनसे पूछा कि आप लोग ही बताएं कि इस अपराध की क्या सजा होनी चाहिए, इसका क्या समाधान होना चाहिए, उन्हों ने बदले में मांग की कि वैसे ही हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की भी तस्वीर बनाकर लटकाई जाए ताकि हम भी उसकी आंख फोड़ सकें। उमर बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: हम मुसलमान अपने नबी की तस्वीर बनाते ही नहीं तो आखिर यह अनुमति हम तुम्हें कैसे दे सकते हैं, हाँ! इसके बदले में मेरी आँखें उपस्थित हैं आप उन्हें फोड़ सकते हो। यह न्यायपूर्ण फैसला सुनकर वह लज्जित हुए,  अतः उन्हों ने माफ कर दिया और बदला नहीं लिया।

मुसलमानों की यही सहिष्णुता थी कि कितने ग़ैर-मुस्लिम स्कालर ने इसे स्वीकार किया: फ्रेंच लेखक गोस्ताफ लोबोन ने कहा: “लोगों ने अरबों के जैसे सहिष्णुता का व्यवहार करने वाला कोई समुदाय नहीं पाया और न अरबों के धर्म के जैसे किसी अन्य धर्म में वैसी सहिष्णुता देखी गई। “

लेकिन बुरा हो शत्रुता तथा गंदी राजनीति का कि कुछ लोग इस्लाम दुश्मनी में जो चाहते हैं अपनी ज़बान से बक देते हैं। मैं चैलेंज के साथ कहता हूं कि जो व्यक्ति भी इस्लाम का विशाल दृदय से अध्ययन करेगा उसकी सत्यता, उदारता तथा धार्मिक सहिष्णुता का समर्थन किए बिना नहीं रह सकता।

सहिष्णुता का अर्थ अपनी पहचान खोना नहीं:

सहिष्णुता का मतलब यह नहीं है कि मुसलमान अपनी पहचान खो दें? नहीं और बिल्कुल नहीं, धार्मिक सहिष्णुता के नाम पर ग़ैर-मुस्लिमों का तरीका अपनाना हराम है, और उनके धार्मिक विश्वास और त्योहारों का समर्थन करना कुफ्र है, ग़ैर मुस्लिम को अपने धर्म पर चलने का पूरा अधिकार है लेकिन मुसलमान अगर उनके विश्वास का समर्थन करें तो खुद उनका इस्लाम ही शेष नहीं रहेगा। इस्लाम एक सार्वभौमिक धर्म है जो किसी सहारे का मोहताज नहीं, मुसलमान जहाँ भी हों ईमान, इबादत, मामले और नैतिकता में उनके लिए आवश्यक है कि वे इस्लामी शरीयत का अनुसरण करें। सुनन अबीदाऊद की रिवायत के अनुसार अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: “जो दूसरों की नकल करे, वह हम में से नहीं”। (सही अबू दाऊद: 4031)

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