दयापवित्र क़ुरआन में अल्लाह ने पिछले समुदायों का वृत्तान्त बयान किया है और उनकी जीवनी पर विचार विमर्ष करने की दावत दी है, तथा अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल. को भी आदेश दिया कि वह लोगों को पिछली क़ौमों के क़िस्से सुनायें, क्यों कि क़िस्सों द्वारा संदेश को समझने में आसानी होती है और उनमें खुला पाठ, सबक़ और उपदेश होता है। अल्लाह ने कहाः 

فَاقْصُصِ الْقَصَصَ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ [الأعراف:176

“तो तुम वृत्तान्त सुनाते रहो, कदाचित वे सोच-विचार कर सकें।” (सूरः आराफः 176)

अतः हम देखते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने विभिन्न हदीसों में पिछली उम्मतों के क़िस्से बयान किए जिन में हम सब के लिए प्रशिक्षण, संदेश और मार्गदर्शन है। अल्लाह के रसूल ने उन्हीं क़िस्सों में से एक क़िस्सा एक ऐसे व्यक्ति का बताया जो बहुत नेक औल इबादतगुज़ार था लेकिन उसके मुंह से निकली हुई एक बात उसकी दुनिया और आख़िरत बर्बाद करने का कारण बन गई।

सुनन अबी दाऊद की रिवायत है हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुए सुनाः

«كَانَ رَجُلَانِ فِي بَنِي إِسْرَائِيلَ مُتَوَاخِيَيْنِ، فَكَانَ أَحَدُهُمَا يُذْنِبُ، وَالْآخَرُ مُجْتَهِدٌ فِي الْعِبَادَةِ، فَكَانَ لَا يَزَالُ الْمُجْتَهِدُ يَرَى الْآخَرَ عَلَى الذَّنْبِ فَيَقُولُ أَقْصِرْ –أيِ ابْتَعِدْ عَنِ الذَّنْبِ- فَوَجَدَهُ يَوْمًا عَلَى ذَنْبٍ، فَقَالَ لَهُ: أَقْصِرْ. فَقَالَ: خَلِّنِي وَرَبِّي، أَبُعِثْتَ عَلَيَّ رَقِيبًا؟! فَقَالَ: وَاللَّهِ لَا يَغْفِرُ اللَّهُ لَكَ، أَوْ لَا يُدْخِلُكَ اللَّهُ الْجَنَّةَ، فَقَبَضَ أَرْوَاحَهُمَا، فَاجْتَمَعَا عِنْدَ رَبِّ الْعَالَمِينَ، فَقَالَ لِهَذَا الْمُجْتَهِدِ: أَكُنْتَ بِي عَالِمًا؟! أَوْ كُنْتَ عَلَى مَا فِي يَدِي قَادِرًا؟! وَقَالَ لِلْمُذْنِبِ اذْهَبْ فَادْخُلِ الْجَنَّةَ بِرَحْمَتِي، وَقَالَ لِلْآخَرِ اذْهَبُوا بِهِ إِلَى النَّارِ»

बनू इस्राईल में दो व्यक्ति थे जिनकी आपस में मित्रता थी। उनमें से एक पापी था और दूसरा इबादत में लगा रहता था। नेक दोस्त हमेशा अपने भाई को पाप करते देखता तो कहताः पाप करना छोड़ दो। एक दिन नेक दोस्त ने उसे पाप करते पाया तो उस से कहाः पाप करना छोड़ दो। उसने कहाः मुझे मेरे रब के हवाले छोड़ दो, क्या तुम मुझ पर निगराँ बनाकर भेजे गए हो ? यह सुन कर नेक दोस्त ने कहाः अल्लाह की क़सम अल्लाह तुझे बिल्कुल माफ नहीं करेगा। या अल्लाह तुझे जन्नत में दाख़िल नहीं करेगा। जब दोनों की मृत्यु हुई तो दोनों अल्लाह के पास एकत्र हुए, अल्लाह ने नेकी करने वाले से कहाः क्या तुम मेरे सम्बन्ध में जानते थे ( कि मैं उसके पाप क्षमा नहीं करूंगा) या मेरे हाथ में जो कुछ है क्या तू उसका अधिकार रखता था। फिर पापी से कहा कि जाओ मेरी दया से जन्नत में दाख़िल हो जाओ। और दूसरे के सम्बन्ध में आदेश दिया कि इसे जहन्नम में ले कर जाओ।

इस हदीस को बयान करने के बाद अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं:

«وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَتَكَلَّمَ بِكَلِمَةٍ أَوْبَقَتْ دُنْيَاهُ وَآخِرَتَهُ».

क़सम है उस अल्लाह की जिसके हाथ में मेरी जान है, उसने एक बात बोल दी जिसने उसकी दुनिया और आख़िरत दोनों को तबाह कर दिया।

और सही मुस्लिम में जुन्दुब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बयान कियाः

«أَنَّ رَجُلاً قالَ: وَاللَّهِ لَا يَغْفِرُ اللَّهُ لِفُلَانٍ، وَإِنَّ اللَّهَ تَعَالَى قَالَ: مَنْ ذَا الَّذِي يَتَأَلَّى عَلَيَّ [يَعْنِي: مَنْ هَذا الَّذِي يَحْلِفُ؟] أَنْ لَا أَغْفِرَ لِفُلَانٍ؟! فَإِنِّي قَدْ غَفَرْتُ لِفُلَانٍ وَأَحْبَطْتُ عَمَلَكَ».

एक व्यक्ति ने कहाः अल्लाह की क़सम, अल्लाह फ़लाँ व्यक्ति को क्षमा नहीं करेगा। तब अल्लाह ने कहाः कौन है जो मुझ पर क़सम खाता है कि मैं फलाँ को क्षमा नहीं करूंगा, जाओ मेंने फलाँ के पापों को क्षमा कर दिया और तुम्हारे अमल को बर्बाद कर दिया।

इस क़िस्सा में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बनू इस्राइल के दो दोस्तों की स्थिति बयान की है जिनमें से एक नेक था दूसरा बुरा था, नेक दोस्त बुरे दोस्त को बुराई करते देखता तो उसे रोकता, और रोकना भी चाहिए क्यों कि इस्लाम हमें आदेश देता है कि जब कोई बुराई देखें तो उसे हाथ से रोकें, अगर हाथ से रोकने की ताक़त नहो तो ज़ुबान से रोकें, अगर ज़ुबान से रोकने की ताक़त नहीं है तौ दिल में उसे बुरा समझें और यह ईमान का कमज़ोर तरीन दर्जा है। जब वह बार बार इनकार करता रहा तो इस से थक कर बुरे दोस्त ने कह दिया कि तुम कोई मुझ पर निगराँ बनाकर नहीं भेजे गए, मुझे अपनी हालत पर छोड़ दो, मेरा मामला अपने रब से होगा, मेरे जीवन में हस्तक्षेप मत करो। यह सुन कर उसके नेक दोस्त ने भावनात्मक बात कह दी कि अल्लाह तुम्हें कदापि क्षमा नहीं करेगा, हालाँकि हमारा काम किसी पर हुक्म लगाना नहीं बल्कि हमारा कर्तव्य मात्र यह है कि हम अच्छाई और बुराई को खोल खोल कर बयान कर दें। उन्होंने यह दावा किया कि अल्लाह तुझे माफ नहीं करेगा हालाँकि अल्लाह क्षमा करने वाला, दया करने वाला और तौबा स्वीकार करने वाला है। किसी को यह अधिकार नहीं कि अल्लाह का यह हक़ उस से छीन ले, वह अपने बन्दे को मौत से पहले भी तौबा की तौफीक़ दे सकता है।

इस हदीस से हमें यह भी पता चलता है कि एक बन्दे को हमेशा बुरी मौत से डरते रहना चाहिए, हम देखते हैं कि नेक बन्दा जन्नत में जाने से रह गया और बुरा बन्दा अल्लाह की दया से जन्नम में दाख़िल हो गया।

अह्लिसुन्नत वल-जमाअत का अक़ीदा है कि वह किसी के लिए जन्नती या जहन्नमी होने की गवाही नहीं देते सिवाय उनके जिनके जन्नती या जहन्नमी होने की गवाही अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दी हो। लेकिन वह नेक लोगों के लिए अल्लाह से उमीद रखते हैं और बुरे लोगों से भय खाते हैं।

उम्मि अला अनसारिया रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि जब हज़रत उस्मान बिन मज़्ऊन रज़ियल्लाहु अन्हु का देहांत हुआ तो वह उनके पास गईं, उन्हों ने कहाः अबुस्साइब! अल्लाह आप पर दया करे, आपके लिए मेरी गवाही है कि अल्लाह ने आपका सम्मान किया। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः  

 «وَمَا يُدْرِيكِ أَنَّ اللَّهَ قَدْ أَكْرَمَهُ؟ فَقُلْتُ: بِأَبِي أَنْتَ يَا رَسُولَ اللَّهِ، فَمَنْ يُكْرِمُهُ اللَّهُ؟ فقالَ: أَمَّا هُوَ فَقَدْ جَاءَهُ الْيَقِينُ، وَاللَّهِ إِنِّي لَأَرْجُو لَهُ الْخَيْرَ، وَاللَّهِ مَا أَدْرِي، وَأَنَا رَسُولُ اللَّهِ، مَا يُفْعَلُ بِي، قَالَتْ: فَوَاللَّهِ لَا أُزَكِّي أَحَدًا بَعْدَهُ أَبَدًا» [رواهُ البُخارِيُّ]،

तुम्हें क्या पता कि अल्लाह ने उनका सम्मान किया है, मैंने कहाः मेरे बाप आप पर क़ुरबान हों ऐ अल्लाह के रसूल! तो फिर अल्लाह किनका सम्मान करेगा? आपने कहा कि उनको मृत्यु आ चुकी है, अल्लाह की क़सम हम उनके लिए भलाई की उमीद रखते हैं, अल्लाह की क़सम मैं नहीं जानता हालाँकि मैं अल्लाह का रसूल हूं कि मेरे साथ क्या होने वाला है। यह सुन कर उन्हों ने कहाः अल्लाह की क़सम अब मैं इसके बाद किसी का तज़्किया नहीं करूंगी। (बुख़ारी)

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